आर्ट एंड कल्चर – क्या प्रासंगिकता खो रहा है टेलीविजन ?

दिल्ली
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– मिहिर पंड्या (सिनेमा-साहित्य पर लेखन, दिल्ली विवि में असिस्टेंट प्रोफेसर)

पिछले दिनों घर में टेलीविजन खरीद की बात सुनकर जब दोस्त ने आश्चर्य प्रकट किया, मैंने उसे बताया कि टीवी दरअसल बड़ी स्क्रीन पर सिनेमा स्ट्रीमिंग और वेब सीरीज देखने भर के लिए है। पारंपरिक अर्थों में शायद इसे ‘टेलीविजन’ कहना भी ठीक न हो। मेरे बहुत से दोस्तों के घरों में अब टीवी नहीं है। मुझसे अगली पीढ़ी के ऊपर यह बात और ज्यादा लागू होती है। इसे नोटिस कम लोगों ने किया, लेकिन हाथ में स्मार्टफोन लिए समूची नई मध्यवर्गीय पीढ़ी के जीवन से पारंपरिक टेलीविजन की अनिवार्यता खत्म-सी हो गई है।

जबकि अभी तीन दशक पहले की ही तो बात है जब टीवी हमारे ड्रॉइंग-रूम का अनिवार्य हिस्सा बना था। घरों का सबसे पसंदीदा और सहज सरल मनोरंजन का माध्यम। इस मनोरंजन माध्यम ने अस्सी के उत्तरार्ध और नब्बे की शुरुआत के सालों में सिनेमा और सिनेमाघरों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया था। टीवी इतना ताकतवर था कि २१वीं सदी की शुरुआत पर सिनेमा के महानायक इसी टेलीविजन की स्क्रीन के जरिये अपनी खोई सिनेमाई लोकप्रियता वापिस हासिल करने की जुगत भिड़ा रहे थे। लेकिन आज ठीक बीस साल बाद 21वीं सदी के तीसरे दशक की शुरुआत पर भारतीय टेलीविजन पुराने स्टाइल के घिसे-पिटे मनोरंजन धारावाहिकों, निम्नस्तरीय रियलिटी शो, प्रायोजित सिनेमा प्रचार, सरकारी प्रचार और फेक न्यूज का अड्डा बन गया है।

अस्सी के दशक के पूर्वार्ध में एक दूसरा मनोरंजन का माध्यम भी हमारी जिंदगियों में आया था। बयासी के एशियाड के साथ टीवी ने मध्यवर्गीय भारत के बैठकखानों में प्रवेश किया, तो तिरासी की विश्वकप जीत ने एकदिवसीय क्रिकेट को सबका चहेता क्रिकेट फॉरमेट बना दिया। फिर 21वीं सदी के पहले दशक में आगमन हुआ टी-ट्वेंटी का। पहले लगा था कि क्रिकेट का यह सबसे तेज फॉरमेट सबसे धीमे खेल रूप को हमेशा के लिए खत्म कर देगा। लेकिन आज सचाई यह है कि खेल के दो अतिवादी सिरों पर खड़े टेस्ट एवं टी-ट्वेंटी दोनों के अपने-अपने वफादार मौजूद हैं, जबकि एकदिवसीय क्रिकेट तेजी से प्रासंगिकता खो रहा है। यहां टेस्ट क्रिकेट की जगह सिनेमा को रख दें, टी-ट्वेंटी की जगह स्ट्रीमिंग चैनल्स को और एकदिवसीय की जगह टेलीविजन को, तो सारी तस्वीर हमारी आंखों के सामने स्पष्ट हो जाती है।

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