कोरोना नहीं प्रकृति के साथ रहना सीखें

इटावा उत्तर प्रदेश सम्पादकीय
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विश्व पर्यावरण दिवस पर पर्यावरण की काफी चिंता होती है, लेकिन यह सिर्फ एक दिन की चिंता करने की बात नहीं है। इन दिनों कोरोना संक्रमण के दौर से पूरा विश्व गुजर रहा है इस दौर में अब ऐसी बातें भी चलने लगी है कि हमें कोरोना के साथ रहना सीखना होगा। लेकिन इसके उलट यह कहा जा सकता है कि कोरोना नहीं हमें प्रकृति के साथ रहना सीखना होगा। हम प्रकृति के साथ जिएंगे तो कोरोना जैसे तमाम रोगों से बचे रहेंगे। भारतीय परम्पराओं का पालन करके प्रकृति के साथ रहें और तमाम रोगों से दूर रहे।
कोरोना के साथ रहने की बात समझ में नहीं आती है इसकी जगह यह कहा जाना चाहिए कि हमें प्रकृति के साथ रहना सीखना होगा और जब हम प्रकृति के साथ रहेंगे तो तमाम परेशानियों से बचे रहेंगे। प्रकृति को नुकसान ना पहुंचाएं तथा वन्यजीवों को भी अनावश्यक रूप से परेशान ना करें। आज कोरोना के दौर में जिस तरह से रहने की बातें हो रही हैं यह सब वही बातें हैं जिनका हम सब भारतीय पहले अनुसरण करते आए हैं। हम भारतीय परंपरा के अनुसार प्रकृति के साथ जिए तो हमें ना कोरोना वायरस तरह का कोई और रोना हमारे सामने आएगा।
हमारे यहां प्राचीन काल में यह कहावत रही है कि जो वन (जंगल) गया वह बन गया। भगवान राम भी वन (जंगल) गये तभी उन्होंने कई ऐसे कार्य किए जिसके कारण वह पूज्नीय है। चाहे अन्याय से पीड़ित लोगों को न्याय दिलाने का काम हो या फिर आतताईयो का अंत करने का काम हो। यह सभी उन्होंने वन (जंगल) में जाकर ही किया। वर्तमान दौर में जब कोरोना हमारी जान के पीछे पड़ा है तब जरूरत इस बात की है कि हम भारतीय परंपराओं का पालन करते हुए प्रकृति के साथ रहना सीखें।

(संजय सक्सेना)
वरिष्ठ पत्रकार/पर्यावरणविद

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